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Showing posts from August, 2014

Garbh Sanskar : Health Concern about pregnant women & her baby !!

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Garbh Sanskar : Health Concern about pregnant women & her baby:-Eating habits for a pregnant woman: It is important for a would-be mother to eat well. Make sure she should get necessary nutrients for herself and her developing baby.  The diet must have needed vitamins and minerals, iron etc. Need a few more calories during pregnancy as well. Limit junk food, as it has lots of calories with few or no nutrients. Would be parent should follow the recommended diet as suggested by the Health care professional. A healthy diet intake is vital for a successful pregnancy and a healthy baby. A balance diet can help to correct hormone imbalances that may affect ability to conceive. There are certain foods that may lower the fertility. Source of healthy food ingredients: For Calcium, protein and Vitamin B-12: Milk and dairy products like Buttermilk, skimmed milk, yogurt-curd, cottage cheese. These products in combination with sea fish and sea salt or iodised salt are good sources of iodine. The…

Garbh Sanskar : Importance of Pranyam and Its Benefits !!

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Garbh Sanskar : Importance of Pranyam and Its Benefits: Pranayama has the capacity of freeing the mind from untruthfulness, ignorance and all other painful and unpleasant experiences of the body and mind; and when the mind becomes clean it becomes easy for the Sadhaka to concentrate on the desired object and it becomes possible for him to progress further in the direction of Dhyana and Samadhi. By Yog asanas, we remove the distortions and disabilities of the physical body and bring it into discipline.
However Pranayama influences the subtle and the physical bodies in a greater measure than Yogsanas do and that too in a perceptible manner. In the human body, lungs, heart and brain hold very important positions and they depend on each other heavily for their health. Physically, Pranayam appears to be a systematic exercise of respiration, which makes the lungs stronger, improves blood circulation, makes the man healthier and bestows upon him the boon of a long life. Physiology teaches us…

Significance of Vedic Yantras !!

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Significance of Vedic Yantras :-  Among the sacred symbols compiled / designed by the Vedic Rishis, Yantras are predominantly regarded as devices for devotional sadhanas. These are used as tools for mental concentration and meditation. Keeping specific Yantra in specific direction in the home and worshiping it and concentrating upon it is said to have distinct auspicious effects. 
A Mantra is the generator of specific currents of sublime sound and its perceivable manifestation, a Yantra is a monogram  a spectrograph, of this sonic energy. In terms of their spiritual effects, Yantras are like schematic sketches of the contours or structures of divine energy fields. 
Use of Yantras as the object of sadhana enables focused use of specific currents of cosmic energy. Incidentally, the Sanskrit word for machines, instruments or technological devices is also "yantra". 
The Vedic Yantras are also attributed in the scriptures as source of beneficial results in short time. These are l…

Gayatri-Vedic-Mahamantra - Divine Shakti !!

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Gayatri-Vedic-Mahamantra represents the Supreme Spiritual Spirit which empower the devotee with the power, energy, strength, knowledge etc. The grace of Divine Mantra Shakti showers boons of strength, peace, wisdom and prosperity.
Those aspiring to become devotees of Shakti will have to focus themselves to panchopchar pujan (five-fold worship) of Mahashakti, which manifest as
(1) physical power,
(2) mental power,
(3) emotional power,
(4) financial power and
(5) spiritual power. 

Earning and righteous use of these powers leads to happy and healthy life. 
Lets understand the nine words ofGayatri-Mahamantra:

|| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ||

हे परमात्मा ! हम सबको सद्बुद्धि दें, उज्जवल भविष्य के मार्ग पर आगे बढायें
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतःकरण में धारण करें. वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे.

|| AUM bhoor-bhuvah svah tat-savitur-varenyam 

bhargo devasya dheemahi dhi…

गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - दूसरो को प्रभावित करना एवं रक्षा-कवच !!

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दूसरो को प्रभावित करना --
            जो व्यक्ति अपने प्रतिकूल है उन्हें अनुकूल बनाने के लिये,उपेक्षा करने वालो में प्रेम उत्पन्न करने के लिये गायत्री द्दारा आकर्षण क्रिया की जा सकती  है। वशीकरण तो घोर तांत्रिक क्रिया द्दारा ही होता है, पर चुम्बकीय आकर्षण , जिससे किसी  व्यक्ति का मन अपनी ओर सदभावनापूर्वक आकर्षित हो, गायत्री की दक्षिण मार्गी इस योग-साधना से हो सकता है।
      गायत्री मन्त्र का जप तीन प्रणव लगाकर करना चाहिये की अपनी त्रिकुटी (मस्तिष्क के मध्य भाग) में से एक नील वर्ण विघुत-तेज की रस्सी जैसी शक्ति निकलकर उस व्यक्ति तक पहुचती है,जिसे आपको आकर्षित करना है और उसके चारों ओर अनेक लपेट  मारकर लिपट जाती है। इस प्रकार लिपटा हुआ व्यक्ति अर्द्धतंद्रित अवस्था में धीरे-धीरे खिंचता चला आता है और  अनुकूलता  की प्रसन्न मुद्रा उसके चेहरे पर छाई हुई होती है। आकर्षण के लिये यह ध्यान बड़ा प्रभावशाली है ।
किसी के मन में , मस्तिष्क में से उसके अनुचित विचार हटाकर उचित विचार भरने हो, तो ऐसा करना चाहिए कि शान्तचित्त  होकर उस व्यक्ति को अखिल नील आकाश में अकेला सोता हुआ ध्यान करे और भावना करे कि उसके…

गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - दरिद्रता का नाश, शत्रुता का संहार एवं भूत-बाधा की शान्ति !!

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दरिद्रता   का  नाश--
           दरिद्रता , हानि, ऋण,बेकारी, साधनहीनता, वस्तुओ का अभाव, कम आमदनी, बढा  हुआ खर्च, कोई रुका हुआ आवश्यक  कार्य आदि की व्यर्थ चिन्ता से मुक्ति दिलाने में गायत्री साधना बड़ी  सहायक सिद्ध होती है। उससे ऐसी मनोभूमि तैयार हो जाती है, जो वर्तमान अर्थ-चक्र से निकलकर साधक को सन्तोषजनक स्थिति पर पंहुचा दे।
         दरिद्रता -नाश के लिये गायत्री की 'श्री' शक्ति की उपासना करनी चहिये। मन्त्र  के आरंभ तथा अन्त में तीन - तीन बार 'श्रीं'  बीज का सम्पुट लगाना चहिये।  साधना काल के लिए पीत वस्त्र ,पीले पुष्प ,पीला यज्ञोपवित ,पीला तिलक, पीला आसन प्रयोग करना चाहिये । शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिश करनी चाहिये और रविवार को उपवास करना चाहिये। पीताम्बर धारी , हाथी पर चढ़ी  हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिये । पीतवर्ण लक्ष्मी का प्रतीक है, भोजन में पीली चीज़े प्रधान रूप से लेनी चाहिये। इस प्रकार की साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।

शत्रुता का संहार ---
            द्देष ,कलह,मुकदमाबाजी, मनमुटाव को दूर करना और अत्याचारी , अन्यायी, अकारण आक्…

गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - बुद्धि -वृद्धि एवं राजकीय सफलता !!

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गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - बुद्धि -वृद्धि एवं राजकीय सफलता :

बुद्धि -वृद्धि --
       गायत्री प्रधानत: बुद्धि को शुद्ध ,प्रखर और समुन्नत करने वाला मन्त्र है। मन्द बुद्धि ,स्मरण शक्ति की कमी वाले इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते है । जो बच्चे अनुत्तीर्ण  हो जाते है ,पाठ ठीक प्रकार याद नहीं कर पाते ,उनके लिये निम्न उपासना बहुत उपयोगी है। 
        सूर्योदय के समय की प्रथम किरणे पानी से भीगे हुए मस्तक पर लगने दे । पूर्व की ओर मुख करके अधखुले नेत्रों से सूर्य का दर्शन करते हुए आरम्भ में तीन बार ॐ का उच्चारण करते हुए गायत्री का जप करे । कम से कम एक माला (१ ० ८ मन्त्र )अवश्य जपना चाहिये । पीछे हाथों की हथेली का भाग सूर्य की ओर इस प्रकार करे ,मानो आग पर ताप रहे है । इस स्थिति में बारह मन्त्र जपकर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिये और उन उष्ण हाथों को मुख ,नेत्र ,नासिका ,ग्रीवा ,कर्ण ,मस्तक आदि समस्त शिरोभागो पर फिराना चाहिये । 

राजकीय सफलता --
              किसी सरकारी कार्य ,मुकदमा ,राज्य स्वीकृति ,नियुक्ति आदि में सफलता प्राप्त करने के लिये गायत्री का उपयोग किया जा सकता है । जिस समय अधिकारी …

गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - रोग एवं विष निवारण

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गायत्री महाविज्ञान अनुभूत प्रयोग - रोग एवं विष निवारण :
रोग निवारण --
स्वयं रोगी होने पर जिस स्थिति में भी रहना पड़े ,उसी में मन ही मन गायत्री का जाप करना चाहिये । एक मन्त्र समाप्त होने और दूसरा आरम्भ होने के बीच  में  एक "बीज मंत्र" का सम्पुट भी लगाते चलना चाहिये । सर्दी प्रधान (कफ) रोग में 'एं ' em बीज मन्त्र ,गर्मी प्रधान पित्त रोगों में 'ऐं ' aim बीज मन्त्र, अपच एवं विष तथा वात रोगों में 'हूं ' hoom बीज मन्त्र का प्रयोग करना चाहिये । निरोग होने के लिए वृषभ -वाहिनी हरित वस्त्रा गायत्री का ध्यान करना चाहिये ।    
दूसरो को निरोग करने के लिए भी इन्ही बीज मन्त्रो का और इसी ध्यान का प्रयोग करना चाहिये । रोगी के पीड़ित अंगो पर उपर्युक्त  ध्यान और जप करते हुए हाथ फेरना, जल अभिमन्त्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं छिडकना चाहिये । इन्ही परिस्थतियो में  तुलसी पत्र और कालीमिर्च  गंगाजल में पीसकर दवा के रूप में देना ,यह सब उपचार ऐसे है ,जो किसी भी रोग के रोगी को दिये जाए ,उसे लाभ पहुचाये बिना न रहेंगे । 

विष-निवारण --
 सर्प, बिच्छू, बर्र,ततैया ,मधुमक्खी  और जहरीले जी…

Garbh Sanskar Testimonial by PRANGYA NAMITA AND SUBRAT KUMAR MAHARAJ from ORISSA, INDIA

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Garbh Sanskar Testimonial by PRANGYA NAMITA AND SUBRAT KUMAR MAHARAJ from ORISSA, INDIA

Normally we like to read the books of Guru Pandit Sriram Sharma acharya. We almost read each & every book published in Oriya language. And during reading of this books, we came to know how the sanskar procedures made by our ancients; make a positive effect in human life both in physical& mental level. But all these sanskars are not followed for us or by us. we husband and wife decided to follow all the sanskars to bring a divine soul to this world. The 1st come to our mind is Garbha sanskar”.so we search for it in many books & websites and in last we came in contact with the Holy Spirit. Dr. Anand dhingra. His procedures and guidelines inspired us too much. As per his instructions the first step we move to sendhwa, Madhya prades, Gayatri dham organised by His highness pandit jee. We follow the procedures of panchakarma i.e. purification of body & mind. And then second step was onlin…